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महाराजजी

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महाराजजी की जीवनी

महाराजजी का जन्म एक संपन्न ब्राह्मण जमींदार घराने में अकबरपुर नामक गाँव (जिला - फिराज़ाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ। मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्श अष्टमी को वो इस धरा पर अवतरित हुए। उनके पिता श्री दुर्गा प्रसाद शर्मा ने उनका नाम लक्ष्मीनारायण शर्मा रखा। बाल्यावस्था से ही महाराजजी का सांसारिक वस्तुओं से मोह छूट गया था। ग्यारह वर्ष की आयु में उनका विवाह एक धनी ब्राह्मण परिवार की लड़की से कर दिया गया।
विवाह के ठीक बाद महाराजजी घर छोड़कर गुजरात चले गए। इस समय उन्होंने गुजरात एवं भारत के अन्य प्रदेशों में भ्रमण किया। करीब 10-15 वर्ष बाद किसी व्यक्ति ने उनके पिता को सूचित किया कि उनके पुत्र जैसा कोई साधु नीब करौरी नामक गाँव (जिला - फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश)  में देखा गया है।
उनके पिता अपने पुत्र से मिलने तुरंत नीब करौरी गए। वहाँ वो महाराजजी से मिले और उन्हें घर लौटने का आदेश दिया। महाराजजी अपने पिता के आदेशानुसार वापस लौट आये। तदुपरान्त महाराजजी के दो व्यक्तित्व उभर के आये - एक गृहस्थ का और दूसरा सन्यासी का।
 
वो अपने परिवार का पूरा ध्यान रखते थे और साथ ही साथ अपने विस्तृत परिवार अर्थात् सम्पूर्ण विश्व का भी ख्याल रखते थे। दोनों ही कार्यों को वो एक ही ढंग से करते थे। गृहस्थ जीवन से उनके दो पुत्र एवं एक सुपुत्री हैं।

वो कहते थे कि सम्पूर्ण विश्व उनका परिवार है (स्त्रोत - राम दास लिखित 'मिरेकिल औफ लव') और मानते थे कि - सबसे प्रेम करो, सबकी सेवा करो, सबको खिलाओ। वो कहते थे कि यही भगवान को पाने की कुंजी है। वो जन्म से ही संत थे। जहाँ भी गये उन्होंने यज्ञ और भंडारे कराये। दोनों साथ-साथ कराये जाते थे - यज्ञ देवताओं को खिलाने के लिए और भंडारे सामान्य मनुष्यों को। उन्होंने बहुत जगहों पर हनुमानजी के मंदिर बनवाए। निर्वाण से पहले उन्होंने दो आश्रम भी स्थापित किये।

पहला आश्रम कैंची (जिला - नैनीताल, उत्तरांचल) में और दूसरा वृन्दावन (जिला - मथुरा, उत्तर प्रदेश) में है। महाराजजी ने अपनी महासमाधि के लिए वृन्दावन को चुना। वृन्दावन वही भूमि है जहाँ कृष्ण ने अपनी लीलाएँ कीं।
09 सितम्बर, 1973  को महाराजजी ने कैंची से आगरा के लिए प्रस्थान किया। यह उनकी कैंची की अंतिम यात्रा थी और आने से पहले उन्होंने वहाँ काफी संकेत छोड़े कि अब वो वापस नहीं आयेंगे। 10 सितम्बर को आगरा पहुँचने पर वो तुरंत वृन्दावन के लिए रवाना हुए जहाँ उन्होंने 11 सितम्बर को समाधि ली।

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